Taiba Ilyas Poetry Portfolio

Taiba Ilyas | Urdu & Hindi Poetry
Taiba Ilyas
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Taiba Ilyas
لفظوں کی دنیا، احساسوں کی زبان
Urdu & Hindi Poetry Writer · Custom Shayari for Every Occasion
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About
The Poet Behind the Words

I am Taiba Ilyas — an Urdu and Hindi poet who believes that every feeling deserves its perfect words. My poetry flows from the deepest corners of human emotion: love, longing, hope, and the quiet strength it takes to keep going.

With years of writing experience, I craft verses that speak directly to the heart. Whether you need a heartfelt ghazal, a moving nazm, or custom shayari for a special occasion — I write poetry that feels personal, honest, and unforgettable.

Available for custom poetry orders on Fiverr. Every poem is written exclusively for you.

جو دل میں ہے، وہ الفاظ میں ڈھالوں گی
آپ کے جذبے، میری شاعری بولے گی
Portfolio
My Poetry
01
Seekh Liya
जब तूने धीरे-धीरे मेरी तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ करना सीख लिया, मैंने तेरे बग़ैर हर तकलीफ़ सहना सीख लिया…
जब तूने धीरे-धीरे मेरी तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ करना सीख लिया, मैंने तेरे बग़ैर हर तकलीफ़ सहना सीख लिया। जब तूने मुझे गले लगाए बिन सोना सीख लिया, मैंने भी तेरी बाहों के बग़ैर रातों को रोना सीख लिया। जब तूने मेरी आँखों से गिरते आँसू बिन पोंछे चले जाना सीख लिया, मैंने तेरे सामने दर्द छुपाकर मुस्कुराना सीख लिया। जब तूने मुझे अपनी ज़िंदगी में कोई अहमियत न देना सीख लिया, मैंने भी तेरे प्यार के बग़ैर जीना सीख लिया।
02
Open Soul
मैं उड़ना चाहती हूं, समंदर की लहरों को, छूना चाहती हूं, मैं भी ज़िंदा, रहना चाहती हूं…
मैं उड़ना चाहती हूं, समंदर की लहरों को, छूना चाहती हूं, शाम का वो मंज़र, देखना चाहती हूं, मैं भी ज़िंदा, रहना चाहती हूं! आज़ाद रूह बनकर, दुनिया को करीब से देखना चाहती हूं, किसी पंछी की तरह, अपनी मन मानी करना चाहती हूं, मैं भी जीना चाहती हूं! वो तीन नदियों का संगम और शाम का मिलन देखना चाहती हूं। उन नज़ारों को अपनी इन आंखों में उतारना चाहती हूं। जानती हूं, ये शायद मुमकिन नहीं मेरे लिए, फिर भी मैं ज़िंदगी जीना चाहती हूं। इस दुनिया को भुला कर, मैं उस दुनिया की हो जाना चाहती हूं। पहाड़ों और नदियों में समा जाना चाहती हूं, वहीं कहीं अपना घर बसाना चाहती हूं। सूरज की पहली किरण के साथ उठना, और हवाओं के साथ बस बहते रहना चाहती हूं। मैं दुनिया घूमना चाहती हूं, मैं भी ज़िंदगी जीना चाहती हूं!
03
Umeed
एक आस है जो जगाए रखती है रात दिन, एक प्यास है जो सोने नहीं देती…
एक आस है जो जगाए रखती है रात दिन, एक प्यास है जो सोने नहीं देती। एक चमक है जो आंखों में बस्ती है, एक ठोकर है जो बार बार लगती है। है उम्मीद दिल में कहीं जगी हुई, तेरे होने से पास मेरे रहती है। मैं सोऊं या जगूं, ये हमेशा मेरा खयाल रखती है। तन्हा रहकर भी देखा है मैंने, ये तन्हाई बहुत चुभती है। जब याद आती है तेरी, ये गले लगकर मुझसे खूब रोती है। ये बात सुनी-सुनी है कि, प्यार और जंग में सब जायज़ होता है। पर सब जायज़ नहीं होता, ये बात मैनें सुनी नहीं ज़िंदगी से सीखी है।
04
Pehli Mohabbat ki Aakhiri Qist
सफर आसान नहीं, पर जीना तो है; मोहब्बत का ये जाम, पीना तो है…
सफर आसान नहीं, पर जीना तो है; मोहब्बत का ये जाम, पीना तो है। आसान नहीं यूं मर जाना भी, महफिल में तुम्हे अकेला छोड़ जाना भी आसान नहीं! हम तो यहीं मिलेंगे तुम्हे..., महफिल-ए-दुनिया से दिल भर जाए तो लौट आना यहीं। मंजिल हराम हो गई हम पर, जबसे इस सफर को चुन लिया हमनें, रो-रो कर थक गई आंखें, पर आसमान चूम लिया हमनें। रह गए देखने वाले देखते ही रह गए, जब हर गली, हर मोहल्ले में हमारी मैय्यत के नगाड़े बज गए। हां... सोचा तो नहीं था कभी, इस कदर तड़पेंगे हम भी कभी! अब तो थकन होने लगी है, मोहब्बत और इश्क में जंग होने लगी है। ज़िंदगी उम्मीद का नाम है, उम्मीद बनाए रखना, और कोशिश करना भूल जाना हमें, क्योंकि अब हमारी ज़िंदगी किसी और के नाम होने लगी है।
05
Raat Se Meri Mulaqat
रात को अपना साथी समझती रही, और उसी में खुशियां ढूंढती रही…
रात को अपना साथी समझती रही, और उसी में खुशियां ढूंढती रही। मुझे क्या मालूम था... कि एक दिन यही रात रुलाएगी मुझे। मैं हर किसी के लिए रेत थी, और रेत ही रही! सब ठोकर मारते गए और मैं बहती गई। मैं सन्नाटे की वो आवाज बनकर रह गई, जिसे कोई सुन ही न सका, मैं मजबूर रही, और कुछ न कह सकी। एक दफा मोहब्बत तो सबको होती है, मुझे भी हुई! पर मैं तन्हा थी, और तन्हा ही रही! मोहब्बत एक तरफा जो थी। मैं अंधेरे में उस जुगनू की तलाश करती रही, जो किसी और के छत पर चमकने की चाहत रखता था। मैं बेलावजह उसका इंतजार करती रही..., और वो, वो किसी और का! मैं सदा उसकी ही रही..., और वो, वो किसी और का!
06
Meri Pehchaan, Mera Abhimaan
जानती हूं, बहुत कमियां है मुझमें, फिर भी प्यार है मुझे खुद्से…
जानती हूं, बहुत कमियां है मुझमें, फिर भी प्यार है मुझे खुद्से। क्योंकि कमियों का मतलब बुरा होना तो नहीं! जानती हूं, मैं बच्ची भी नहीं, पर हरकतें बचकानी हैं मेरी। बड़ों से ज्यादा बनती नहीं! हां..., क्योंकि बड़े होशियार होते हैं, और होशियारी मेरे बस की नहीं! जानती हूं, गलतियों की दुकान हूं मैं, पर क्या करूं इंसान हूं मैं। रसोई घर अच्छी जगह है! रसोई में खाने बनते हैं, पर क्या करूं रसोई से मेरी बनती नहीं! जानती हूं, बहुत मूडी हूं मैं, खाने की शौकीन भी नहीं हूं। थोड़ी अजीब हूं, पर क्या करूं यही हूं मैं। प्यार-व्यार की बातों से दूर ही रहती हूं, पर प्यार के बिना रह भी नहीं पाती हूं मैं। जानती हूं, लापरवाह सी हूं मैं! ना ज़िम्मेदार हूं, और ना ज़िम्मेदारी लेना चाहती हूं! मैं तो ज़िंदगी को जीना चाहती हूं..., और ज़िंदगी लंबी नहीं बड़ी चाहती हूं!
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